लोकतंत्र के लिए फेक न्यूज – मौन लेकिन गहरा खतरा

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लोकतंत्र की सफलता का आधार एक जागरूक, सूचित और विवेकशील नागरिक समाज होता है। जब नागरिक सही और तथ्यपरक जानकारी के आधार पर अपने विचार तथा निर्णय बनाते हैं, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होती है किंतु वर्तमान डिजिटल युग में फेक न्यूज यानी झूठी और भ्रामक खबरें लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर सामने आई हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की तीव्रता ने असत्य को इस कदर फैलाया है कि कई बार सत्य उसकी चपेट में आ जाता है। फेक न्यूज केवल गलत सूचना भर नहीं होती बल्कि यह सुनियोजित ढंग से तैयार की गई ऐसी सामग्री भी हो सकती है जिसका उद्देश्य जनमत को प्रभावित करना, राजनीतिक लाभ लेना, सामाजिक विद्वेष फैलाना या आर्थिक फायदा उठाना होता है। आधी-अधूरी सूचनाएं, संदर्भ से काटे गए बयान, एडिट किए गए वीडियो और सनसनीखेज शीर्षक इसके सामान्य रूप हैं। समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब लोग बिना सत्यापन के ऐसी खबरों को आगे साझा कर देते हैं।

लोकतंत्र पर फेक न्यूज का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव जनमत पर पड़ता है। चुनावी समय में फैलने वाली अफवाहें और झूठे प्रचार मतदाताओं की सोच को भ्रमित कर देते हैं। नागरिक सही मुद्दों के बजाय भावनात्मक और भ्रामक सूचनाओं के आधार पर निर्णय लेने लगते हैं जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। इसके अलावा, लगातार झूठी खबरों के कारण मीडिया, न्यायपालिका, प्रशासन और अन्य संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास कमजोर होने लगता है, जो लोकतंत्र के लिए घातक है।
फेक न्यूज सामाजिक ताने-बाने को भी गहरा नुकसान पहुंचाती है। धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के नाम पर फैलने वाली भ्रामक सूचनाएं समाज में अविश्वास, तनाव और नफरत को जन्म देती हैं। कई बार यह स्थिति हिंसा तक पहुंच जाती है जिससे सामाजिक सौहार्द और शांति भंग होती है। इस प्रकार फेक न्यूज न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है बल्कि सामाजिक एकता को भी खतरे में डाल देती है। इस समस्या के पीछे कई कारण हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम सनसनीखेज और उत्तेजक सामग्री को तेजी से फैलाते हैं। डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण लोग खबरों के स्रोत और सत्यता की जांच नहीं कर पाते। राजनीतिक ध्रुवीकरण और वैचारिक कट्टरता भी झूठी खबरों के प्रसार को बढ़ावा देती है। इसके साथ ही, क्लिकबेट संस्कृति और विज्ञापन आधारित कमाई ने फेक न्यूज को एक लाभकारी उद्योग का रूप दे दिया है।
लोकतंत्र में मीडिया को चैथा स्तंभ कहा जाता है और उसकी जिम्मेदारी सत्य को सामने लाने की होती है हालांकि प्रतिस्पर्धा और टीआरपी की दौड़ में कई बार मीडिया भी तथ्यों की अनदेखी कर देता है जिससे समस्या और गहराती है। ऐसे में मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी और आत्मसंयम अत्यंत आवश्यक हो जाते हैं। फेक न्यूज से निपटने के लिए बहुआयामी प्रयासों की जरूरत है। डिजिटल साक्षरता को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा, ताकि नागरिक खबरों का विवेकपूर्ण विश्लेषण कर सकें। स्वतंत्र फैक्ट-चेकिंग संस्थाओं को प्रोत्साहन देना और उनकी पहुंच बढ़ाना आवश्यक है। साथ ही, संतुलित और स्पष्ट कानूनों के माध्यम से फेक न्यूज फैलाने वालों पर कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे। सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करना और नागरिकों में जिम्मेदारी की भावना विकसित करना भी समय की मांग है।
फेक न्यूज लोकतंत्र के लिए एक मौन लेकिन गहरा खतरा है। इससे निपटने के लिए केवल कानून या तकनीक ही नहीं बल्कि नागरिकों की जागरूकता और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता भी आवश्यक है। जब समाज सत्य को प्राथमिकता देगा और जिम्मेदारी से सूचना का उपयोग करेगा, तभी लोकतंत्र इस संकट से सुरक्षित रह सकेगा।


डा वीरेन्द्र भाटी मंगल

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