ईयू की गैर-शुल्क बाधाएं अक्सर शुल्क कटौती के प्रभाव घटाती हैं;एफटीए इसे ठीक कर सकता है: जीटीआरआई

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नयी दिल्ली, 19 जनवरी (भाषा) भारत को प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते के तहत घरेलू उत्पादों विशेष रूप से कृषि एवं दवा क्षेत्रों में, गैर-शुल्क बाधाओं को हटाने के लिए यूरोपीय संघ (ईयू) पर दबाव डालना चाहिए, क्योंकि इस तरह के प्रतिबंध अक्सर शुल्क कटौती के लाभों को ‘‘कमजोर’’ कर देते हैं।

आर्थिक शोध संस्थान जीटीआरआई ने सोमवार को यह बात कही।

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की वार्ता के निष्कर्ष की घोषणा 27 जनवरी को यूरोपीय संघ के प्रतिनिधिमंडल की भारत यात्रा के दौरान होने की उम्मीद है। 18 वर्ष के बाद यह समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है। वार्ता 2007 में शुरू हुई थी।

यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन 25 से 27 जनवरी तक भारत की राजकीय यात्रा पर रहेंगे। वे 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि हैं।

यूरोपीय संघ में भारतीय उत्पादों को जिन बाधाओं का सामना करना पड़ता है उनमें दवा संबंधी अनुमोदनों में नियामकीय देरी, खाद्य एवं कृषि निर्यात जैसे गोमांस को प्रभावित करने वाले कड़े स्वच्छता एवं पादप स्वच्छता (पौधों व जानवरों से संबंधित) नियम और जटिल परीक्षण, प्रमाणीकरण तथा अनुरूपता-मूल्यांकन आवश्यकताएं शामिल हैं।

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के अनुसार, बासमती चावल, मसाले और चाय जैसे कृषि निर्यात अक्सर यूरोपीय संघ द्वारा कीटनाशक अवशेषों की सीमा में भारी कमी के कारण अस्वीकार कर दिए जाते हैं या उनकी गहन जांच की जाती है जबकि समुद्री निर्यात में ‘एंटीबायोटिक’ दवाओं की चिंताओं के कारण अधिक नमूना लेने की दर लागू होती है।

इसमें कहा गया कि विनिर्माण क्षेत्र में, रसायनों के लिए ‘रीच’ जैसे नियमों एवं जलवायु संबंधी बदलते नियमों का अनुपालन करने से लागत में काफी वृद्धि होती है विशेष रूप से सीमित प्रमाणन क्षमता वाले सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए..।

जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘ यूरोपीय संघ के साथ किसी भी व्यापार समझौते में नियामक सहयोग, त्वरित अनुमोदन एवं पारस्परिक मान्यता के बिना केवल शुल्क उदारीकरण से निर्यात में आनुपातिक लाभ नहीं मिलेगा।’’

उन्होंने कहा कि व्यापार समझौते में कार्बन कर को लेकर भारत की प्रमुख चिंताओं का भी समाधान होना चाहिए। कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम) एक जनवरी से उन उत्पादों पर लागू हो गया है जो अपने निर्माण प्रक्रियाओं के दौरान उच्च कार्बन उत्सर्जन करते हैं जैसे कि इस्पात और एल्युमीनियम।

श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘ यूरोपीय संघ ने अमेरिकी वस्तुओं को सीबीएएम से छूट देकर पहले ही लचीलापन दिखाया है और भारत भी इसी तरह की मांग कर सकता है।’’

उन्होंने कहा कि यह कर विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए हानिकारक है, जिन्हें अनुपालन की उच्च लागत, जटिल ‘रिपोर्टिंग’ आवश्यकताओं और मनमाने ढंग से निर्धारित उत्सर्जन मूल्यों के आधार पर दंडित किए जाने का जोखिम झेलना पड़ता है।

उन्होंने कहा, ‘‘ छूट, अपवाद या कम से कम सुरक्षात्मक प्रावधानों (सीबीएएम पर) के बिना, एफटीए संरचनात्मक रूप से असंतुलित हो सकता है जिससे यूरोपीय संघ के सामानों को भारत में शुल्क-मुक्त प्रवेश मिल सकेगा जबकि भारतीय निर्यात यूरोप के जलवायु-संबंधी सीमा उपायों से बाधित रहेगा।’’

वहीं 27 देशों का यह समूह भारत के करीब 600 अरब अमेरिकी डॉलर के सरकारी खरीद बाजार तक पहुंच चाहता है जिसमें केंद्र सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा दिए गए अनुबंध शामिल हैं।

श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘ भारत संभवतः सीमित पहुंच प्रदान करेगा, यह बताते हुए कि यूरोपीय संघ का अपना खरीद बाजार विदेशी कंपनियों के लिए काफी हद तक बंद है। भारत अधिक से अधिक ब्रिटेन के साथ हुए समझौतों के समान सीमित प्रतिबद्धताएं पेश कर सकता है।’’

भारत और यूरोपीय संघ, भौगोलिक संकेतक (जीआई) और निवेश संरक्षण समझौतों पर अलग-अलग बातचीत कर रहे हैं।

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