विष्णुदेव मंडल
आप केकड़े के बारे में जरूर जानते होंगे और आपने उसे देखा भी होगा। केकड़ा एक विचित्र जलीय जीव है। ये जल के बाहर नमी या गीले स्थानों में बिेल बना कर रहते हैं। इसके आठ पैर और दो चिमटे होते हैं जो हाथों का काम करते हैं। बिल खोदने से लेकर आहार पकड़ कर अपने मुंह में डालने तक का सारा काम इसी चिमटे से करता है।
केकड़ा अपने आठों पैर की सहायता से आगे पीछे किसी भी तरफ आसानी से चल सकता है। यह एक रात में तीन से चार फिट बिल खोद लेता है। इसके शरीर के अंदरूनी हिसे कवच से ढके रहते हैं। कवच के सबसे ऊपरी हिस्से में मूंग के दानों के बराबर उभरी हुई दो आंखें होती हैं।
केकड़ा अधिक गहरे पानी में नहीं रहता क्योंकि इसके ऊपर भी पानी का दबाव पड़ता है। इसका भोजन जलीय कीड़े मकोड़े, जलीय पौधे आदि है। मादा केकड़ी अपनी पूरी जिंदगी में सिर्फ एक बार लाखों बच्चों को जन्म देकर मर जाती है।
इसका प्रजननकाल दिसंबर से जनवरी तक होता है। फरवरी से मार्च तक लाखों अंडे दे देती है। मार्च के अंतिम सप्ताह तक अंडों से बच्चे निकल आते हैं। अंडे मादा केकड़ी के पेट के नीचे एक खोल में रहते हैं। इसी खोल से नर और मादा की पहचान होती है।
मादा केकड़ी के पेट की खोल, गोल होती है और कुछ बड़ी भी। नर केकड़े के पेट की खोल छोटी और नुकीली होती है।
बच्चों को जब भूख लगती है, तब अपनी मां के पेट को खुरच खुरच कर खाते रहते हैं। इससे केकड़ी कमजोर होकर मर जाती है। फिर बच्चे अपनी मां के पेट के खोल से बाहर निकल कर अपनी दुनियां बसाते हैं। लाखों बच्चों में से कुछ बच्चे मर जाते हैं और कुछ बच्चे बच जाते हैं। बच्चे अपनी माता के पेट की खोल से निकलने तक कुछ बड़े भी हो जाते हैं।
केकड़ा धान की फसल के दुश्मन भी हैं क्योंकि धान के जिस खेत में केकड़ों के दल अधिक संख्या में होते हैं उस धान की फसलों को काट काटकर गिरा देते हैं। केेकड़ा सूखी जमीन पर भी कई दिनों तक जीवित रह सकता है।
केकड़े प्रायः दो प्रकार के होते हैं, तेलिया और दुधिया। तेलिया केकड़ा चट्टानों की दरारों में, नदियों में पाए जाते हैं। इसके शरीर का कोई अंग तोड़ कर या काट कर अलग किये जाने पर इसके शरीर से सरसों के तेल जैसा पदार्थ निकलता है। दरअसल यह पदार्थ उसका खून होता है जो हीमोग्लोबिन के कारण ऐसा रंग का होता है। इस केकड़े के दांत मनुष्य के दांतों की तरह विकसित होते हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि मनुष्य के दांत बड़े और अधिक संख्या में होते हैं जबकि केकड़े के छोटे और चार दांत होते हैं। इस केकड़े का शरीर सख्त और कठोर होता है।
तेलिया केकड़े की खासियत होती है कि वह रात भर बिल खोदने में लगा रहता है और प्रातः होने पर ओस चाटने के लिए बाहर निकलता है, फिर सूर्योदय होने पर अपने बिल में दुबक कर बैठ जाता है।
केकड़े मिट्टी खाकर भी अपना गुजारा कर लेते हैं। जो केकड़े तालाबों में रहते हैं और जब तालाब सूखने लगते हैं, तब उस केकड़े का क्या होता है. जानकर आपको आश्चर्य होगा कि ज्यों-ज्यों तालाब का पानी सूखता जाता है, त्यों त्यों केकड़ा बिल को और गहरा खोदता जाता है। जहां भूमिगत जल का रिसाव शुरू होता है वहां तक जाने की कोशिश करता है ताकि वहां जाकर आराम से रह सके।
मगर बिल खोदते खोदते तालाब का पानी पूरी तरह सूख जाता है, तब तक केकड़ा भी मर जाता है कुछ समय बाद वह मिट्टी में मिल जाता है। केकड़े का सपना अधूरा रह जाता है। इस अवधि तक तालाब की मिट्टी भी सूख कर सख्त और कठोर हो जाती है।
दुधिया केकड़ा कम पानी वाले स्थानों पर पाया जाता है। इसका शरीर इतना कोमल और नाजुक होता है कि चलते फिरते ही मर जाता है। इस केकड़े का कोई अंग तोड़कर शरीर से अलग करने पर इसके शरीर से गाय भैंस के दूध जैसा पदार्थ निकलता है। दरअसल यह दूध जैसा पदार्थ उसका खून है। यह केकड़ा हल्का गर्म पानी या वर्षा की बूंदों को भी सहन नहीं कर पाता।
दुनिया का सबसे बड़ा और अनूठा केकड़ा हिंद व प्रशांत महासागर में पाया जाता है जो तीन फीट लंबा और चार किलो से अधिक वजनी होता है। यह नारियल का कड़ा छिलका भी उतार कर खा लेता है।
