संवैधानिक मूल्य: गणतंत्र की आत्मा और नागरिक दायित्व

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भारतीय संविधान केवल शासन चलाने का दस्तावेज नहीं, बल्कि एक जीवंत दर्शन है जो देश की आत्मा, उसकी चेतना और दिशा—तीनों को परिभाषित करता है। संविधान की उद्देशिका में निहित स्वतंत्रता, समता, समानता, बंधुता, संप्रभुता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र जैसे मूल्य पूरे संविधान की वैचारिक रीढ़ हैं। ये मूल्य “हम भारत के लोग” द्वारा स्वयं को दी गई वह सामूहिक प्रतिबद्धता हैं जो प्रत्येक नागरिक को अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी निरंतर स्मरण कराती है। संविधान का सच्चा सम्मान केवल औपचारिक आयोजनों से नहीं, बल्कि इन मूल्यों को अपने व्यवहार और सार्वजनिक जीवन में उतारने से होता है। भारत 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस की 77वीं वर्षगांठ मना रहा है। 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा भारतीय संविधान को अंगीकार किया गया और 26 जनवरी 1950 को इसे देश की शासन व्यवस्था के रूप में लागू किया गया। यह वही ऐतिहासिक क्षण था, जब भारत औपनिवेशिक शासन की छाया से बाहर निकलकर एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में विश्व पटल पर स्थापित हुआ। गणतंत्र दिवस केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान का आत्मावलोकन और भविष्य का संकल्प भी है। संविधान की प्रस्तावना में निहित मूल्य हमारे दैनिक जीवन से गहराई से जुड़े हुए हैं। ये हमें बताते हैं कि नागरिक होना केवल अधिकारों का उपभोग करना नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करना भी है। समानता और न्याय जैसे मूल्य समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक अवसर और सम्मान पहुंचाने की संवैधानिक भावना को सुदृढ़ करते हैं। लोकतंत्र की सार्थकता इसी में है कि सत्ता का केंद्र केवल संस्थाएं नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक हों। भारतीय संविधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण करता है—विचार, अभिव्यक्ति, आस्था और गरिमापूर्ण जीवन की स्वतंत्रता। यह स्वतंत्रता नागरिकों को अपनी पहचान के साथ जीने का अधिकार देती है, लेकिन साथ ही यह भी अपेक्षा करती है कि स्वतंत्रता अनुशासन और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहे। अधिकार और कर्तव्य के इसी संतुलन में लोकतंत्र की स्थायित्व और विश्वसनीयता निहित है। संविधान राष्ट्रीय एकता और अखंडता का भी मजबूत आधार प्रस्तुत करता है। भारत विविधताओं का देश है—यहां अनेक धर्म, भाषाएं, संस्कृतियां और परंपराएं सह अस्तित्व में हैं। यही विविधता सदियों से भारत की पहचान और शक्ति रही है। बंधुता का संवैधानिक मूल्य हमें यह सिखाता है कि भिन्नताओं के बावजूद हम एक साझा राष्ट्रीय चेतना से जुड़े हैं और परस्पर सम्मान ही राष्ट्र को मजबूती देता है। संविधान निर्माताओं ने सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय की स्थापना का स्वप्न देखा था। यह स्वप्न तब तक पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक नागरिक स्वयं इसके लिए सजग, जागरूक और सक्रिय न हों। अन्याय, भेदभाव और असमानता के विरुद्ध आवाज़ उठाना केवल नैतिक साहस नहीं, बल्कि एक संवैधानिक दायित्व भी है। लोकतंत्र तब कमजोर पड़ता है, जब नागरिक मौन दर्शक बन जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई प्रतिभा, अनुभव या क्षमता होती है। यदि उसका उपयोग समाज के हित में किया जाए तो सामाजिक परिवर्तन की गति स्वतः तेज हो सकती है। जब समाज सशक्त होगा, तभी राष्ट्र सशक्त बनेगा। यह परिवर्तन केवल नीतियों या कानूनों से नहीं, बल्कि नागरिकों की सोच, व्यवहार और सहभागिता से संभव है। आज के समय में राष्ट्रीय एकता, शांति, सद्भाव और आपसी विश्वास की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। संवाद की जगह टकराव और सहमति की जगह विभाजन समाज को कमजोर करता है। प्रेम, मेलजोल और आपसी समझ से ही लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं। हमारे महामानवों ने जिस भारत की परिकल्पना की थी—जहां न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता का संतुलन हो—हमें उसी वैचारिक दिशा में निरंतर आगे बढ़ना होगा। इसके लिए ऐसे सामाजिक और सांस्कृतिक प्रयासों की आवश्यकता है, जो विभिन्न समुदायों को एक-दूसरे के करीब लाएं। सभी धर्मों और संस्कृतियों का सम्मान करना भारतीयता की मूल पहचान है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि हम अपने संविधान को पढ़ें, समझें और उसके मूल्यों को अपने व्यवहार में उतारें। संविधान मानवतावादी है—समानता, गरिमा और न्याय का संरक्षक। गणतंत्र दिवस का अर्थ केवल परेड, भाषण या तिरंगा फहराने तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है—संविधान को अपने जीवन में जीना। जब तक संवैधानिक मूल्य केवल पुस्तकों और औपचारिक समारोहों तक सीमित रहेंगे, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा। सच्चा गणतंत्र वही है, जहां नागरिक अन्याय के विरुद्ध खड़ा हो, भिन्नताओं का सम्मान करे और समाज के कमजोर वर्ग के साथ खड़ा दिखाई दे। डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा देखे गए भारत का सपना तभी साकार होगा, जब प्रत्येक नागरिक यह समझे कि संविधान केवल शासन का आधार नहीं, बल्कि हमारी साझा नैतिक जिम्मेदारी है। यही गणतंत्र दिवस का वास्तविक संदेश और सबसे बड़ा संकल्प होना चाहिए। बाबूलाल नागा लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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