सनातन संस्कृति पर बुना षड्यंत्र : त्योहारों की तिथियों का अपहरण
Focus News 22 January 2026 0
पहले दीपावली के पहले ‘नरक चतुर्दशी’ कोई उत्सव मनाया जाने वाला दिवस न था। घरों की सफाई आदि के बाद दीवाली को घूर पर दिया जलाया जाता था ताकि वह भी नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त हो जाए और तैयार खाद शुद्ध होकर खेतों में पहुँचे। इधर कुछ वर्षो से हिन्दू पर्व, त्योहार निर्धारित तिथि पर न मनाने की परम्परा सी चल पड़ी है। मुमकिन है कि इसके पीछे बाजार, कारोबारी हित तथा रोजगार पैदा करने की प्रत्याशा हो किन्तु यह पारम्परिक सनातन संस्कृति को विकृत करने का षड्यंत्र और कुचक्र अधिक जान पड़ता है। अयोध्या में दीपावली के पूर्व का ‘दीपोत्सव’ अनजाने या जान-बूझकर उपर्युक्त शंका की एक बड़ी साजिश लगती है। अब 15 जनवरी को मकर संक्रान्ति का अवकाश इसी की अगली कड़ी है। इसी तरह से पिछले दिनों, सालों में अनेक त्योहार बदली तिथियों में मनाये गये हैं। यह भारतीय सनातन संस्कृति और ब्राह्मणों के ज्ञान, विज्ञान एवं अनुसन्धान को खण्डित करने वाली प्रवृत्ति है। इसके पीछे अफसरशाही का एक तबका हो सकता है जो शिक्षा, सोच, समझ तथा संस्कार से न केवल गुलाम है बल्कि विकृत विदेशी संस्कृति का पिट्ठू और पोषक है।
सुनियोजित कुचक्र :
पारम्परिक हिन्दू पञ्चाङ्ग की तिथियों से त्योहारों को खींचकर बाजार की गोद में धकेलने की प्रवृत्ति सनातन धर्म की जड़ों को काटने का सुनियोजित कुचक्र है। नरक चतुर्दशी जो दीपावली से ठीक एक दिन पहले कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को मनायी जाती रही, अब पूर्व-दीपोत्सवों के बहाने विकृत हो रही है। यह केवल बाजारवाद नहीं अपितु इसके पीछे अफसरशाही के उस तबके का हाथ है जो विदेशी संस्कृति का दास बनकर स्वधर्म को खण्डित कर रहा है।
पारम्परिक महत्व की उपेक्षा :
‘नरक चतुर्दशी’ परम्परागत रूप से दीपावली की पूर्व सन्ध्या है जब भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया और घरों की सफाई के बाद नकारात्मक ऊर्जा नाश के लिए दीप जलाये जाते थे। अयोध्या में दीपोत्सव को दीपावली से पूर्व (जैसे 2025 में 18-20 अक्टूबर जबकि दीपावली 20-21 को) आयोजित करना शास्त्रीय पञ्चाङ्ग को तोड़ने-मरोड़ने का उदाहरण है। इसी क्रम में मकर संक्रान्ति का अवकाश उत्तर प्रदेश में 14 से 15 जनवरी 2026 को स्थानान्तरित कर दिया गया जो ज्योतिषीय पुण्यकाल से मेल खाता है किन्तु परम्परा से भटकाव दर्शाता है।
बाजार और कारोबार का कुप्रभाव :
हिन्दू त्योहार अब बाजार की रणनीति बन गये हैं, जहाँ ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म दीपावली-नवरात्रि पर ₹12-14 लाख करोड़ का व्यय उत्पन्न करते हैं, 15-30% वृद्धि के साथ।
फेस्टिवल सेल्स, मुहूर्त ट्रेडिंग और रोजगार सृजन के नाम पर तिथियाँ बदली जाती हैं, जैसे होली, दशहरा, राखी जो कभी-कभी दो तिथियों पर विभाजित हो जाते हैं। यह व्यावसायिक हित सनातन पञ्चाङ्ग को विकृत कर रहा है, जहाँ सूर्य सिद्धान्त पर आधारित संक्रान्ति जैसे पर्व ग्रेगोरियन कैलेण्डर से 24 दिन विस्थापित हो चुके हैं।
अफसरशाही का विदेशी दासत्व :
भारतीय नौकरशाही में औपनिवेशिक विरासत प्रबल है जो नियम-प्रक्रियाओं पर अत्यधिक जोर देकर परिणामों की उपेक्षा करती है और पदानुक्रमित ‘एलिटिज्म’ को बढ़ावा देती है। सरकारी अवकाश सूचियों में हिन्दू तिथियाँ अक्सर पञ्चाङ्ग से विचलित होती हैं, जैसे जन्माष्टमी या रक्षाबन्धन के राज्यवार भेद। उत्तराखण्ड जैसे प्रयास हिन्दू तिथियाँ जोड़ने के होते हैं, किन्तु केन्द्रीय स्तर पर ग्रेगोरियन प्रभुत्व बना है। यह तबका शिक्षा-संस्कार से विमुख होकर पश्चिमी संस्कृति का पोषक बन गया है, जो सनातन ज्ञान-विज्ञान को ‘ब्राह्मण परम्परा’ सहित खण्डित कर रहा है।
प्रमाणित आँकड़े और ऐतिहासिक भटकाव :
2026 के सरकारी अवकाशों में 17 राष्ट्रीय छुट्टियाँ हैं, किन्तु हिन्दू पर्वों की तिथियाँ बैंक, शेयर बाजार और स्कूलों के अवकाशों में असंगति है। मकर संक्रान्ति सौर घटना होने पर भी 14 जनवरी पर स्थिर रहती है ग्रेगोरियन से, जबकि चन्द्र-सौर पञ्चाङ्ग लचीला है। अयोध्या दीपोत्सव पर राजनीतिक विवाद उभरा, जहाँ आलोचक इसे विभाजनकारी बताते हैं। पिछले वर्षों में नवरात्रि, दुर्गा पूजा जैसी तिथियाँ बाजार व अवकाश नीतियों से प्रभावित हुईं जिससे सांस्कृतिक विकृति बढ़ी।
शास्त्रीय चेतावनी और प्रतिकार :
श्रीमद्भगवद्गीता (3.35) में स्वधर्म की अडिगता पर जोर है: “स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।” मनुस्मृति और पुराण सूर्य सिद्धान्त पर पञ्चाङ्ग निर्धारित करते हैं, न कि व्यापारिक हितों पर। ब्राह्मणों का ज्ञान-विज्ञान, जो वेद-उपनिषदों से उपजा है, इस कुचक्र से संकट में है। सनातन बन्धुओं को पञ्चाङ्ग पालन, शास्त्रोक्त तिथियों पर अडिग रहना होगा। अफसरशाही के गुलाम तबके को उजागर कर नीतिगत सुधार आवश्यक हैं अन्यथा सनातन संस्कृति का अपहरण पूर्ण हो जाएगा।
डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर
स्वतंत्र पत्रकार
