गणतंत्र के सामने चुनौतियाँ : हमारा दायित्व

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गणतंत्र केवल शासन-प्रणाली का नाम नहीं है, यह एक जीवित चेतना है जो नागरिकों के आचरण, सोच और साहस से जीवित रहती है। 26 जनवरी 1950 को भारत ने स्वयं को गणराज्य घोषित करते हुए यह संकल्प लिया था कि सत्ता किसी व्यक्ति, वंश या वर्ग की बपौती नहीं होगी, बल्कि जनता की इच्छा और संविधान की मर्यादा से संचालित होगी। यह दिन केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं बल्कि उस संघर्ष, बलिदान और स्वप्न की परिणति है जिसमें एक औपनिवेशिक गुलामी से निकला समाज स्वयं को समानता, स्वतंत्रता और न्याय के पथ पर स्थापित करना चाहता था किंतु आज, जब हम गणतंत्र के दशकों लंबे सफर को पीछे मुड़कर देखते हैं तो यह प्रश्न अनिवार्य रूप से सामने आता है कि क्या हमारा गणतंत्र अपने मूल आदर्शों की दिशा में आगे बढ़ रहा है, या धीरे-धीरे केवल एक औपचारिक ढांचे में सिमटता जा रहा है।

 

भारतीय गणतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता उसका संविधान है, जिसे केवल कानूनों की किताब समझना उसकी आत्मा के साथ अन्याय होगा। यह संविधान सामाजिक क्रांति का दस्तावेज़ है जो एक असमान, विभाजित और शोषित समाज को बराबरी की जमीन देने का वादा करता है। इसमें निहित स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व के मूल्य केवल राज्य के लिए नहीं, बल्कि समाज और नागरिक के लिए भी मार्गदर्शक हैं लेकिन आज सबसे गंभीर चुनौती यह है कि संविधान को उसकी भावना के बजाय सत्ता के अनुकूल व्याख्याओं तक सीमित किया जा रहा है। जब संवैधानिक संस्थाएँ दबाव में आती हैं, जब कानून का प्रयोग न्याय के बजाय प्रतिशोध के लिए होने लगता है, और जब अधिकारों को कृपा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब गणतंत्र की आत्मा आहत होती है।

 

लोकतंत्र का मूल स्वभाव असहमति है। प्रश्न, बहस और आलोचना के बिना लोकतंत्र निर्जीव हो जाता है। किंतु आज का समय ऐसा प्रतीत होता है जहाँ असहमति को अपराध और सवाल पूछने को राष्ट्रविरोध के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है। विश्वविद्यालयों, लेखन, कला और मीडिया के क्षेत्र में भय का वातावरण बनना गणतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। जब नागरिक चुप रहने को विवश हो जाए, तब चुनाव भले ही होते रहें, गणतंत्र भीतर से खोखला हो जाता है। यह स्थिति और भी चिंताजनक तब हो जाती है, जब भीड़ की भावना तर्क पर हावी हो जाती है और विवेक की जगह उन्माद ले लेता है। सोशल मीडिया के दौर में झूठ, अफवाह और नफरत इतनी तीव्र गति से फैलती है कि सच को अपना पक्ष रखने का अवसर ही नहीं मिल पाता। गणतंत्र का भविष्य उस समाज में सुरक्षित नहीं रह सकता, जहाँ भावनाएँ तथ्य से ऊपर रखी जाएँ और विवेक को कमजोरी समझा जाए।

 

चुनावी प्रक्रिया, जो गणतंत्र की रीढ़ मानी जाती है, आज स्वयं कई प्रश्नों के घेरे में है। धनबल, बाहुबल, जाति और धर्म आधारित ध्रुवीकरण ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित किया है। चुनाव जनसेवा के संकल्प से अधिक सत्ता-प्राप्ति की होड़ बनते जा रहे हैं। इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी जिम्मेदारी मतदाता की होती है, लेकिन जब नागरिक स्वयं अपने मताधिकार को तात्कालिक लाभ, डर या पहचान की राजनीति के अधीन कर देता है, तब वह अनजाने में गणतंत्र को कमजोर करता है। मत केवल एक बटन दबाने की क्रिया नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला नैतिक निर्णय है। गणतंत्र का स्वास्थ्य इस बात पर निर्भर करता है कि नागरिक अपने अधिकार को कितनी समझदारी और स्वतंत्रता से प्रयोग करता है।

 

भारतीय समाज में गहरी जड़ें जमाए सामाजिक असमानताएँ भी गणतंत्र के सामने एक स्थायी चुनौती हैं। संविधान ने सभी नागरिकों को समान माना, लेकिन सामाजिक व्यवहार में जाति, वर्ग और लिंग के आधार पर भेदभाव आज भी जीवित है। शिक्षा, रोजगार और न्याय तक पहुँच अक्सर सामाजिक पहचान से निर्धारित होती है। जब अवसर समान न हों, तब समान अधिकार केवल कागज़ी रह जाते हैं। स्त्रियों की स्थिति इस असमानता का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। संवैधानिक बराबरी के बावजूद स्त्री आज भी असुरक्षा, हिंसा और भेदभाव का सामना कर रही है। जब तक समाज की आधी आबादी को वास्तविक स्वतंत्रता और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक गणतंत्र पूर्ण नहीं हो सकता।

 

शिक्षा किसी भी गणतंत्र की दीर्घकालिक सुरक्षा की गारंटी होती है लेकिन यदि शिक्षा केवल डिग्री और रोजगार तक सीमित हो जाए और उसमें आलोचनात्मक सोच, वैज्ञानिक दृष्टि और मानवीय मूल्य न हों, तो वह विवेकशील नागरिक के बजाय आज्ञाकारी भीड़ तैयार करती है। अंधविश्वास, पाखंड और अवैज्ञानिक सोच का प्रसार गणतंत्र को भीतर से कमजोर करता है। यह विडंबना है कि जिस देश ने वैज्ञानिक सोच और आधुनिक संविधान को अपनाया, वहीं आज तर्क के बजाय मिथक को प्रतिष्ठा मिलने लगी है। गणतंत्र की रक्षा केवल सीमाओं पर नहीं होती, वह कक्षाओं, पुस्तकों और विचारों में भी होती है।

 

मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, आज एक कठिन दौर से गुजर रहा है। सत्ता से सवाल पूछने की जगह जब मीडिया सत्ता का विस्तार बन जाए, तब नागरिक को सच तक पहुँचने का रास्ता संकरा हो जाता है। प्रचार और समाचार के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है। ऐसी स्थिति में नागरिक का दायित्व और बढ़ जाता है कि वह सच और शोर के बीच अंतर करे, स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करे और विवेक के साथ सूचनाओं का मूल्यांकन करे।

 

राष्ट्रवाद भी आज एक जटिल चुनौती के रूप में सामने है। राष्ट्र से प्रेम गणतंत्र का स्वाभाविक गुण है लेकिन जब राष्ट्रवाद को नफरत, बहिष्कार और दमन का औजार बना दिया जाए, तब वह गणतंत्र के मूल सिद्धांतों से टकराने लगता है। सच्चा राष्ट्रवाद वह है जो अपने नागरिकों की गरिमा, अधिकार और विविधता की रक्षा करे न कि उन्हें एकरूपता के साँचे में ढालने का प्रयास करे। भारत की आत्मा बहुलता में है, और गणतंत्र उसी बहुलता का संवैधानिक रूप है।

 

अंततः यह स्वीकार करना होगा कि गणतंत्र केवल सरकारों से नहीं चलता, वह नागरिकों के चरित्र से चलता है। अगर नागरिक अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं होगा, तो कोई भी संविधान उसकी रक्षा नहीं कर पाएगा। अगर समाज अन्याय को सामान्य मान लेगा तो कानून निष्प्रभावी हो जाएगा। गणतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं कि सत्ता क्या कर रही है, बल्कि यह है कि नागरिक क्या सहन कर रहा है। चुप्पी सबसे बड़ा खतरा है और सवाल सबसे बड़ा संरक्षण।

 

गणतंत्र को बचाने का अर्थ है—संविधान को पढ़ना, समझना और जीना। इसका अर्थ है—डर के बजाय विवेक से निर्णय लेना, नफरत के बजाय मानवता को चुनना और सुविधा के बजाय सत्य के पक्ष में खड़ा होना। गणतंत्र किसी एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि प्रतिदिन निभाया जाने वाला दायित्व है। यदि हम अपने दायित्वों के प्रति सजग होंगे, तो चुनौतियाँ चाहे कितनी भी गहरी हों, गणतंत्र सुरक्षित रहेगा क्योंकि अंततः गणतंत्र का भविष्य संसद भवनों में नहीं, नागरिक के अंतःकरण में तय होता है।

 

शम्भू शरण सत्यार्थी

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