बेल को अंग्रेजी में आइल फोलिया, संस्कृत में बिल्व, हिन्दी में बेल और कन्नड़ में बललू कहते हैं। इसके पत्तों में तीन या पांच पत्रक होते हैं। पांच पत्रक का बेल वृक्ष दुर्लभ होता है। इसका फल दो सौ ग्राम से लेकर दो किलो तक का होता है। इसका गूदा नारंगी रंग का अत्यंत स्वादिष्टï और सुगंधित होता है। प्रस्तुत है बेल के औषधीय गुणों पर एक नजर :- * बेल का शर्बत प्रात: या रात में पीना अत्यंत लाभप्रद होता है। यह आंतों की शिथिलता को दूर करता है, जिससे मल निष्कासन की क्रिया में तेजी से सुधार होता है। * सिरदर्द में बेल की जड़ को चंदन की तरह घिसकर लेप करने से काफी लाभ होता है। * आंतों के घाव, अल्सर रोग में भी बेल का सेवन काफी फायदेमंद होता है। * बेल का चूर्ण बराबर मात्रा में मिश्री के साथ लेने से खून की कमी और कमजोरी दूर होती है। एक चम्मच बेल के चूर्ण में एक चम्मच मिश्री मिलाकर दिन में तीन बार पानी के साथ लेने से खूनी बबासीर में लाभ होता है। * बेल पेट के कीड़ों को शरीर से बाहर निकालता है। * बेल, के पत्तों का रस सूर्योदय से पहले प्रतिदिन एक-एक चम्मच पीन से मधुमेह की बीमारी दूर होती है। * बेल के पत्तों का भस्म बनाकर शरीर पर मलने से शरीर रोगाणुओं और त्वचा संबंधी दोषों से मुक्त रहता है। आयुर्वेद में बेल के फल और पत्र दोनों को ही समान रूप से उपयोगी माना गया है बेल के फल की मज्जा में क्यूसिलेज पेक्टिन शर्करा तथा टेनिन आदि रसायन पाए जाते हैं। फल का गूदा, बेल पत्र, मूल एवं छाल का चूर्ण तथा पेड़ के अन्य सभी अंग एवं अवयव उपयोग होते हैं। बेल का चूर्ण बनाने के लिए कच्चा, मुरब्बे के लिए अधपका और ताजे शर्बत के लिए पके हुए फल का उपयोग करना चाहिए।