भगवान शंकर पार्वती को तत्वज्ञान का उपदेश देते हुए कहते हैं- ‘हे देवी! प्राणीमात्र के हितार्थ तथा विशेषकर कलियुग के जीवों के लिए वेद शास्त्र के समान ही मैंने आगम शास्त्र की रचना पहले से ही कर दी है, जिसमें वेदों का ही सार है किन्तु इसमें एक विशेषता यह है कि वैदिक मार्ग द्वारा मोक्ष चाहने वाले व्यक्ति को लौकिक विषय भोगों का त्याग करना पड़ता है। वहां इस आगम शास्त्र को अनुयायी के लिए इस शास्त्र में पेय (भोग) और श्रेय (मोक्ष) दोनों को साथ-साथ प्राप्त करने का सुगम मार्ग बतलाया गया है, कहा है कि-
‘यत्रास्ति भोगो नहि तत्र मोक्षो,
यत्रास्ति मोक्षो नहि तत्र भोग:।
श्री सुन्दरी सेवन तत्पराणां,
भोगश्च मोक्षश्चक करस्थ एव॥Ó
यह आगम शास्त्र एक अनूठा शास्त्र है, जिसमें तुच्छ से तुच्छ वस्तु से लेकर उत्तम से उत्तम वस्तु का तथा निकृष्टï से निकृष्टï कार्य से लेकर उत्कृष्टï से उत्कृष्टï कार्य का सुन्दर वर्णन किया गया है। इसके द्वारा चारों वर्णों के लोग अपने-अपने वर्णाश्रम धर्म का अनुसरण करते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति करने में पूर्ण सफल हो सकते हैं। इसमें बताये गए अनुष्ठïान ऐसे सुगम एवं सरल हैं कि मनुष्य सात्विक, राजसिक या तामसिक किसी भी प्रकृति का क्यों न हो, वह इससे इच्छानुसार लाभ प्राप्त कर सकता है। अन्य शास्त्रों के अनुसार ऐसा करना कठिन है। आगम शास्त्र का दूसरा नाम मंत्र शास्त्र या शक्ति शास्त्र भी है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण के कथन ‘योग: कर्मसु कौशलम्Ó के अनुसार कर्मों में कुशलता ही योग है। प्रकृति द्वारा बनाया गया कोई भी पदार्थ अच्छा या बुरा नहीं है। उनकी अच्छाई या बुराई तो उनके व्यवहार पर निर्भर है। दूध को ही लीजिए, यह एक उत्तम पेय पदार्थ है परन्तु यदि वह नमक मिलाकर अथवा अपनी पाचन शक्ति से अधिक मात्रा में पिया जाये तो वह क्या हानिकारक नहीं होगा? संखिया विष है। यदि उसका एक कण भी खा लिया गया तो उसका प्राणघातक परिणाम होगा। परन्तु यदि कोई वैद्य जो चतुर है, इसी संखिया को शोधन कर उसे किसी पौष्टिïक खाद्य पदार्थ के साथ खिलाता है तो वही संखिया पुष्टिïवर्धक और शक्तिदायक सिद्ध होता है। दूध वही है और संखिया भी वही है पर व्यवहार के कारण दूध जो अच्छा है, वह बुरा और संखिया जो बुरा है, वह अच्छा बन जाता है। ठीक इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु के संबंध में समझना चाहिए। क्रोध बुरा है पर यदि शिक्षक या माता-पिता अपने शिष्य एवं पुत्र को कुमार्ग से सुमार्ग पर लाने के लिए क्रोध करते हैं या उसे मारते हैं तो क्या वह बुरा कहा जा सकता है? वह क्रोध तो बच्चे के हित के लिए है। अत: उसे बुरा नहीं कहा जा सकता। राम नाम तीनों कालों में सत्य है पर यदि कोई मनुष्य किसी व्यक्ति की बारात में जाकर या विवाह मण्डप में ‘राम नाम सत्य हैÓ बोले तो क्या सत्य होने पर भी उसका परिणाम अच्छा होगा?
वहां तो राम नाम की सत्यता प्रकट करने वाले की अच्छी धुनाई कर दी जायेगी। मतलब यह कि प्रत्येक समय में देश, काल, व्यवस्था एवं परिस्थिति देखने की आवश्यकता है। जैसी परिस्थिति हो, उसी के अनुसार वैध रूप में अपने में सुचारू रूप से परिवर्तन कर लेना चाहिए। यही बुद्धिमानी है।
शक्ति के बिना कोई भी पुरुषार्थ सफल नहीं हो सकता। प्रत्येक अणु-परमाणु में अधि दैवी शक्ति है, वही उसका संचालन करती है और उसका धर्म कहलाती है। जैसे- आग में गर्मी या जलन, प्रकाश में दाहकता एवं पुरुष में पौरुषत्व यही उसका धर्म है। शक्ति के बिना अग्नि को अग्नि और पुरुष को पुरुष नहीं कह सकते।
शक्ति की उपासना बहिर्मुखी हो सकती है और अंतरमुखी भी। साधना के बाहरी रूप अनेक हो सकते हैं पर साध्य (शक्ति) एक ही है। सारी शक्तियां आत्मा में केंद्रित हैं पर इस आत्मशक्ति को जागृत करने पर ही लौकिक और पारलौकिक सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं। जैसे-
एकैव शक्ति: परमेश्वरस्य
विविधा वदन्ति व्यवहारकाले।
भोगे भवानी पुरुषेषु लक्ष्मी:
कोपे वु दुर्गा प्रलये तु काली:॥
शक्ति (देवी) की उपासना से लौकिक वैभव के अतिरिक्त ज्ञान की भी प्राप्ति होती है। लोक व्यवहार में यह भी देखने में आता है कि बच्चा पिता की अपेक्षा माता को अधिक चाहता है, क्योंकि माता स्वभावत: सहृदय और ममतामयी होती है तथा अपने बच्चे की आवश्यकता का पूरा ध्यान रखती है। आध्यात्मिकता के मार्ग में भी साधक का पिता शिव की अपेक्षा माता दुर्गा के साथ घनिष्ठï संबंध होता है।
साधारण पूजन-अर्चन के अलावा हमारे पर्वो के आध्यात्मिक गुप्त रहस्य भी हैं। जैसे शक्तिपूजा का महान पर्व नवरात्रि महोत्सव को ही लीजिये। बाहरी रूप से तो यह नवरात्रि महोत्सव एक प्रकार का विजयोत्सव है, जो देवी के राक्षसों को मारकर उन पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है परन्तु आध्यात्मिक साधन मार्ग में प्रत्येक तीन-तीन दिनों में क्रमश: महाकाली, महालक्ष्मी तथा महा सरस्वती का पूजन करना अपना एक विशेष महत्व रखता है। इसमें मनुष्य के लिए क्रमोन्नति का जीवत्व से शिवत्व प्राप्त करने के लिए संकेत प्राप्त है।
मानव जीवन का लक्ष्य है- ‘अपने जीव भाव को हटाकर शिव भाव को प्राप्त करना।Ó इसके लिए साधक को सर्वप्रथम अपने अंत:करण से दुर्गुणों, अपवित्रता एवं आसुरी भावों को हटाकर उनके स्थान में सद्गुणों एवं शुद्ध, शान्त भावों को भरना पड़ेगा। इस प्रकार तमोगुण के निकलने तथा सत्वगुण की अभिवृद्धि से साधक के शुद्ध हृदय में क्रमश: धीरे-धीरे ज्ञानोदय होता है। इसके लिए दृढ़ प्रतिज्ञ और अथक प्रयास की अत्यन्त आवश्यकता है।
नवरात्रि के पहले तीन दिन मातृ शक्ति की उपासना दुर्गा या काली के रूप में की जाती है। हम मां दुर्गा से अपनी मलिनता, दुर्गुण और दोषों को नष्टï करने की प्रार्थना करते हैं। इस पर दुर्गा देवी हमारे भीतर आसुरी वृत्ति रूप में जो राक्षसगण हैं, उनसे युद्ध कर उन्हें समूल नष्टï कर डालती है और भयानक कष्टों से हमारी रक्षा करती है। इस प्रकार नवरात्र के प्रथम तीन दिनों में जो महाकाली के पूजन का विधान है, वह हमारे कुसंस्कारों, हमारी दुव्र्यसनाओं तथा आसुरी वृत्तियों के साथ युद्ध कर उन्हें खत्म कर डालने का ही द्योतक है। जब एक बार हमारी आसुरी वृत्तियों की समाप्ति हो चुकी तो हमें उसके स्थान में दैवी सम्पत्ति को श्रीमद्भागवत में वर्णित सात्विक गुणों को भरना पड़ेगा। यदि इन सद्गुणों की वृद्धि यथार्थ रूप से न हुई तो संभव है कि पुरानी वृत्तियां पुन: हम पर हावी हो सकती हैं। अत: सद्गुणों की वृद्धि हेतु हमें बहुत ही सावधानी बरतनी पड़ेगी।
नवरात्रि के मध्य में तीन दिनों में जो महालक्ष्मी का पूजन किया जाता है, वह इसी साधना स्थिति का द्योतक है। महालक्ष्मी अपने भक्तों को दैवी सद्गुणरुप अक्षुण्ण द्रव्य प्रदान करती है। वह सात्विक शक्ति है, वह तुष्टिï है तथा सात्विक पुष्टि है। साधक में जब आसुरी शक्तियां क्षीण हो जाती हैं तथा सात्विक गुणों की वृद्धि हो जाती है तो वह ज्ञानी हो जाता है तथा ज्ञान को पूर्ण रूप से प्राप्त करने में अपने को अधिकारी समझता है। इसी तारतम्य में महासरस्वती का भी पूजन होता है। उनकी दिव्य वीणा मधुर ध्वनि करती है। मां सरस्वती का श्वेत वस्त्रालंकार आत्मज्ञान का द्योतक है। नवरात्रि के अंतिम तीन दिनों में जो महासरस्वती का पूजन किया जाता है, वह नाद ब्रह्मï तथा आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रशस्त है। भगवती सरस्वती की कृपा से विशुद्ध ज्ञान द्वारा जीवन अपने जीव भाव को त्यागकर जीवनमुक्ति प्राप्त करता है। वह सतचित आनन्द रूप हो जाता है। वह सोहं भाव में लीन हो जाता है। यह जीव की विजय है। यही नवरात्र के दसवें दिन अर्थात विजयादशमी का रहस्य है। आध्यात्मिक मार्ग में उपर्युक्त तीनों स्थितियों को पार करने में ही सफलता मिल सकती है, अन्यथा नहीं।
