आपकी कुछ आदतें व उनके प्रभाव

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आदतें अच्छी व बुरी दो तरह की होती हैं। अच्छी आदतें मनुष्य को निरोगी और दीर्घायु बनाती हैं तथा बुरी आदतें कमजोर और अल्पायु बनाती हैं। सूर्य उगने से पहले उठना, सुबह खुले मैदान में टहलना, नित्य स्नान करना इत्यादि अच्छी आदतें हैं। जहां-तहां थूकना, टेढ़ा-मेढ़ा, या झुक कर बैठना, नशाखोरी आदि बुरी आदतें हैं।
किन आदतों का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, उनका वर्णन निम्न हैं:-
पान खाना:- पान खाने वाले प्रायः जहां-तहां पीक फेंका करते हैं। इससे गंदगी फैलती है। इस पीक के साथ रोग फैलाने वाले जीवाणु भी निकलते हैं। पान के साथ जर्दे का उपयोग करने से दांत मैले और कमजोर हो जाते हैं।
जहां-तहां थूकना:- कुछ लोग पान या खैनी खायें न खायें, बिना सोचे-समझे यत्रा-तत्रा थूका करते हैं। इसका जन स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे गंदगी के साथ-साथ बीमारियां भी फैलती है। यक्ष्मा आदि भयंकर रोगों की संख्या इसी असावधानी के कारण बढ़ती जा रही हैं।
थूक के साथ शरीरस्थ कुछ ऐसे विषैले जीवाणु निकलते हैं जो दीर्घजीवी  होते हैं। वे धूल कणों में छिपे रहकर, संयोग पा, निरोग मनुष्यों के शरीर में प्रवेश कर भिन्न-भिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं।
छींकना और खांसना:- छींकते और खांसते समय नाक-मुंह से थूक और श्लेष्मा के कण बाहर निकलते हैं। सर्दी और खांसी छूत की बीमारियां हैं। अनुचित तरीके से, यानी सीधे किसी के मुंह या खाने-पीने की चीजों पर छींकने से उनके जीवाणु दूसरों को इन रोगों का शिकार बना देते है। इसलिये खांसते और छींकते समय मुंह या नाक के सामने कपड़े या रूमाल का प्रयोग आवश्यक है।
उठने-बैठने इत्यादि का ढंग:- शरीर की अच्छी गठन और अच्छे स्वास्थ्य के लिये उठने-बैठने इत्यादि के ढंगों का बहुत बड़ा महत्त्व है। इसको अंग्रेजी में पोश्चर (बैठने की मुद्रा) कहते हैं। बहुत अंशों में बैठने की मुद्रा पर शरीर और जीवन का विकास निर्भर करता है।
शरीर की रचना, कार्य और अवस्था के भेद से इस मुद्रा का भी भेद होता है। किसी खास मुद्रा को आदर्श नहीं माना जा सकता। सतर्क भाव से खड़ा होने का ढंग जैसा कि उनको अभ्यास कराया जाता है, उस पेशे वालों के लिये भले ही आदर्श है परन्तु वह व्यावहारिक नहीं है। इसी प्रकार उठने-बैठने के कुछ गलत तरीके भले ही आकर्षक और क्षणिक महत्त्वयुक्त हों परन्तु आदर्श नहीं।
इसमें महत्त्व की बात यह है कि हमारे उठने-बैठने या खड़े होने का ढंग ऐसा हो कि शरीर कि किसी अंग पर अनावश्यक भार न पड़े, असुविधाजनक न हो तथा थकावट पैदा न करे। झुक कर बैठना, ढीले-ढीले तौर पर झुक कर खड़ा होना और चलना, दोषयुक्त मुद्रायें मानी जाती हैं। वस्तुतः इन तरीकों का बचपन से ही अभ्यास करना और कराना आवश्यक है। यदि बचपन में ही ठीक ढंग से उठने-बैठने की आदत नहीं लगायी गयी तो वह आदत-सी बन जाती है जिसे द्वितीय प्रकृति कहते हैं।
झुककर बैठने और पढ़ने से वक्ष का विकास नहीं हो पाता। रीढ़ की हड्डियों में स्थायी झुकाव उत्पन्न हो जाता है जिनका शरीर के विकास और रचना पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे व्यक्ति जीवन भर अपने शरीर में स्फूर्ति का अभाव अनुभव करते रहेंगे।
अच्छी मुद्रा का साधारण और सरल तरीका है सीधे खड़े होना और बैठना जिसमें रीढ़ की हड्डियों पर आवश्यक दबाव या झुकाव न पड़े। छाती पर दबाव पड़ने से श्वास क्रिया में बाधा पड़ सकती है, फेफडे़ का विकास संकुचित हो जाता है तथा रक्त-संचालन में भी अनावश्यक बाधा पड़ने के कारण कई प्रकार के शारीरिक विकार उत्पन्न हो सकते हैं।
शरीर को किसी विशेष स्थिति में दीर्घकाल तक रखने से मांस-पेशियों पर अनावश्यक बोझ पड़ता है जिससे मनुष्य असुविधा और थकावट अनुभव करने लगता है। उदाहरण के लिये एक ऐसे कर्मचारी को लिया जाये जिसको अधिकतर खड़ा होकर ही काम करना पड़ता हो। यदि उसके कभी-कभी विश्राम करने के लिये बैठने की समुचित व्यवस्था दी जाये तो निश्चित ही कि उसकी कार्यक्षमता बढ़ जायेगी।
दूसरा उदाहरण उस व्यक्ति का लिया जाये जो अपने जीवन के विकास काल में ही दफ्तरों मे बैठकर, बराबर टेबल पर झुके हुये काम करने के लिये बाध्य हैं। दीर्घकाल तक ऐसी स्थिति में बैठे रहने को उसके कन्धे झुक जायेंगे और छाती संकुचित हो जायेगी। उसके स्वास्थ्य पर इसका बुरा प्रभाव पड़ना निश्चित है। अतः किसी खास स्थिति में अधिक समय तक काम करते रहने पर जब असुविधा या थकावट अनुभव होने लगे तो किंचित विश्राम या स्फूर्ति के लिये शरीर संचालन और मनोरंजन  अच्छे स्वास्थ्य और कार्यक्षमता में वृद्धि के लिये आवश्यक होगा।
दोषयुक्त मुद्राओं के सुधार के लिये कसरतों की आवश्यकता हो सकती हैं परन्तु इसका निर्णय किसी योग्य चिकित्सक द्वारा कराना ही हितकर होता है।