
‘मसाज‘ अर्थात् मालिश करने से सिर में कोमलता आती है, दृष्टि को बल मिलता है, सिर तथा त्वचा के रोग दूर होते हैं, देह की पुष्टि होती है, आयु एवं बल की वृद्धि होती है, बाल बढ़ते हैं, नर्म, दृढ़ तथा काले होते हैं, यौन शक्ति बढ़ती है, तनावों से मुक्ति मिलती है तथा त्वचा सम्पूर्ण रूप से चमकदार व कांतिमय बन जाया करती है।
मालिश से शरीर की त्वचा पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। घर्षण के द्वारा त्वचा के रोमकूप खुलते हैं तथा त्वचा से दूषित पदार्थों का निष्कासन होने से शरीर विषरहित होकर आरोग्य की ओर कदम बढ़ाता है। त्वचा की मांसपेशियों में घर्षण द्वारा विस्फारन से रक्त संचार त्वचा की ओर बढ़ने से त्वचा कांतिमय तथा मुलायम बनती है। रोमकूप खुलने से त्वचा द्वारा शरीर में कास्मिक ऊर्जा का संचार बढ़ता है जिससे शरीर दुरूस्त व शक्तिशाली बनता है।
आयुर्वेद शास्त्रा में मालिश या ‘मसाज‘ का बहुत अधिक महत्त्व बताया गया है। मसाज द्वारा शरीर का तंत्रिका तंत्रा तथा रक्तसंचरण तंत्रा तंदुरूस्त तथा सक्रिय बनता है। मालिश द्वारा शरीर की मांसपेशियों तथा बाह्य त्वचा में स्थित नाडि़यों में तनाव उत्पन्न होकर नाडि़यां फैलने से शरीर के बाह्य स्तर की ओर रक्त संचार बढ़ता है तथा इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप हृदय तथा आंतरिक अंगों की ओर भी रक्त संचार में वृद्धि होने से शरीर में शौर्य तथा ऊर्जा का संचार होता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति जागने से शरीर स्वस्थ तथा मजबूत बनता है। शरीर के प्रत्येक अंग में रक्त संचार के बढ़ने से उसमें ताजगी तथा स्फूर्ति का संचार होता है।
‘मालिश‘ हमारी अति-प्राचीन परम्परा की विरासत है जिसे आज हम आधुनिकता एवं समयाभाव के कारणों से त्यागते जा रहे हैं तथा अपने स्वास्थ्य और सौंदर्य की तिलांजलि देते जा रहे हैं।
मसाज क्यों करेंः- सबसे अहम् प्रश्न यह उठता है कि हम मसाज या मालिश क्यों करें? मालिश द्वारा जहां शारीरिक त्वचा की खुश्की समाप्त होती है वहीं शारीरिक स्वास्थ्य की भी वृद्धि होती है। कार्य की अधिकता, तनावों का बोझ, थकावट आदि के कारणों से तन और मन दोनों ही झुंझला उठते हैं। उन्हीं की शान्ति के लिए हमें मसाज करनी या करानी होती है।
साथ ही मसाज का उत्तम स्वास्थ्य से भी गहरा संबंध होता है। अनेक बीमारियों से प्रतिकार के साथ-साथ असमय के बुढ़ापे को भी इससे रोका जा सकता है, नियमित मालिश करने से निम्नांकित रूपों में लाभ की प्राप्ति होती है।
जहां इसके माध्यम से मांसपेशियों का तनाव समाप्त होता है, वहीं शारीरिक ऐंठनों से मुक्ति भी मिलती है।
मसाज के माध्यम से वक्षस्थल की गोलाई बढ़ाई जा सकती है, साथ ही उसको उन्नत व मांसल भी बनाया जा सकता है।
मसाज के माध्यम से शोथ, गठिया, कमरदर्द, पेडू के पेट दर्द, आदि को रोका जा सकता है, साथ ही जलोदर को रोकने में भी सहायता मिलती है।
नियमित मालिश करने से हृदयरोग, बहुमूत्रा रोग, मासिक का दर्द मधुमेह आदि बीमारियां भी नियंत्रित रहती हैं।
सिर की मालिश के द्वारा केशों का विकास, आंखों की मसाज से नेत्रा ज्योति बढ़ती है।
हृदय के आंतरिक अंगों के रक्त संचार में वृद्धि होकर शरीर में शौर्य तथा ऊर्जा का संचार होता है फलस्वरूप शरीर के सभी अंग पुष्ट व त्वचा कांतिमय बन जाते हैं।
मालिश के विभिन्न द्रव्यः- मालिश के लिए विभिन्न तेल इस्तेमाल किए जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार मालिश के लिये काले तिल का तेल सर्वोत्तम माना जाता हैं। वैसे सामान्यतः पीली सरसों का शुद्ध तेल मालिश में काम में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त मौसम के मुताबिक नारियल या जैतून के तेल से भी मालिश की जाती है। दिमागी कमजोरी, सिरदर्द, चक्कर आना जैसे रोगों में बादाम के तेल की मालिश से बहुत फायदा होता है। शुद्ध घी, शहद, मक्खन और दूध से मालिश करने पर यौवनांगों को बल मिलता है तथा त्वचा स्निग्ध, चमकदार और कांतिमय बनती है।
मसाज के समय की खास सावधानियांः- मसाज या मालिश करने का सबसे उपयुक्त समय सुबह का ही माना जाता है। वैसे तो नियमित रूप से प्रतिदिन मालिश करनी चाहिए किंतु किसी कारणवश यह संभव न हो सके तो सप्ताह में कम से कम एक बार मालिश अवश्य ही करनी चाहिए। मालिश करते समय निम्न सावधानियां बरती जानी चाहिए ताकि उचित परिणाम प्राप्त किया जा सके।
मालिश हमेशा खाली पेट तथा सुबह के समय ही उचित मानी गई है।
मालिश शरीर के समस्त अंगों पर की जानी चाहिए तथा मालिश की दिशा हमेशा हृदय की ओर की दिशा में ही होनी चाहिए।
मालिश करने का स्थान खुला तथा हवादार होना चाहिए। मालिश के तुरंत बाद भी बहती हवा या तेज हवा में एकाएक नहीं आना चाहिए।
मालिश के कम से कम आधा घंटे बाद ही स्नान करना चाहिए तथा स्नान के बाद मोटे तौलिये से रगड़-रगड़ कर शरीर को साफ करना चाहिए।
मालिश के बाद अगर किसी कारण से स्नान करने की इच्छा न हो तो मूत्रा त्याग करके शरीर की गर्मी को शांत कर देना चाहिए।
स्तनों के समीप मालिश करते समय नीचे से निपुल की ओर ही करनी चाहिए ताकि स्तन उन्नत व कठोर बने रहें।
वर्जित मसाजः- मसाज पूर्णतः स्वस्थ व्यक्ति को ही करनी या करानी चाहिए, श्वास-दमा, उदर विकार, सूजन (आंत्राशोथ), कफ, दस्त, आदि के रोगियों के लिए मसाज वर्जित होता है। अगर आप किसी अन्य व्यक्ति से मसाज करवा रही हों तो यह अवश्य ध्यान रखें कि उसको कोई त्वचा रोग न हो।
आधुनिक सभ्यता के इस दौर में हम मसाज जैसे नैसर्गिक प्रसाधन को भूलकर अपने कांतिमय यौवन व शारीरिक सुन्दरता पर असमय ही ग्रहण लगा बैठते हैं और चेहरे पर झुर्रियां, हाथ-पांव के जोड़ों के साथ ही कमर का दर्द, यौन संबंधों में अरूचि आदि को निमंत्राण दे बैठते हैं। नियमित रूप से मसाज की आदत को डालकर कामदेव की पत्नी ‘रति‘ के समान सदाबहार यौवन को प्राप्त किया जा सकता है।