Tue. Jul 16th, 2019

श्री कृष्ण की मृत्यु का कारण: अपना ही पुत्र बना भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु का कारण, जानिए पूरी कथा

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आपको बता दें, कि भगवान श्री कृष्ण, श्री हरि विष्णु के 8वें अवतार माने जाता हैं, वही श्री कृष्ण की बाल लीलाओं, महाभारत के युद्ध में उनकी भूमिका और गीता के उपदेश जैसी प्रमुख बातें सभी को स्मरण होगी। मगर भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु उनके पुत्र के कारण कैसे हुई इसके बारे में बहुत ही कम लोगो को पता होगा। वही आज हम आकपो बताने जा रहे हैं कि भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु से जुड़ी उस घटना के बारे में जिसके कारण से उनके पूरे कुल का नाश हो गया तो आइए जानते हैं।

श्री कृष्ण के मृत्यु की कथा— म​हर्षि ​वेद व्यास रचित महाभारत के मौसल पर्व में भगवान श्री ​कृष्ण की मृत्यु और उनकी द्वारिका नगरी के समुद्र में समा जाने का विवरण दिया गया हैं श्री कृष्ण की आठ पत्नियों में से जाम्बवती के पुत्र का नाम सांब था। देवर्षि नारद, दुर्वशा, विश्वामित्र जैसे कई ऋषि मुनि भगवान श्री कृष्ण से मिलने के लिए द्वारका नगरी पहुंचे थे। सांब ने शरारत वश एक स्त्री का वेश धारण कर लिया और उन ऋषि मुनियों से पूछा कि उसके गर्भ में बेटा हैं या बेटी।
वही एक ​ऋषि उसकी शरारत को समझ गए और गुस्से में सांब को श्राप दिया कि वह एक लोहे की तीर को जन्म देगा। जिसके कारण उसके कुल का सर्वनाश हो जाएगा। श्राप से मुक्ति के लिए उसने प्रभाव नदी में तांबे के तीर का चूर्ण बनाकर प्रवाहित किर दिया उस चूर्ण को एक मछली ने निगल लिया कुद समय बाद द्वारका में नशीली चीजों का सेवन बढ़ गया। छल कपट, विश्वासघात जैसी चीजें वहां के लोगो में आ गई थी। लोगो के गलत आचरण और कार्यों से पाप बढ़ गया था।

वही पाप से मुक्ति के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी प्रजा से प्रभास नदी के किनारे व्रत, स्नान आदि का सुझाव दिया। उनकी सारी प्रजा वहां चली गई मगर वहां पर आपस में ही उनकी लड़ाई हो गई जिसमें अंत में श्रीकृष्ण और उनकी प्रजा के कुछ लोग बच गए। वही श्रीकृष्ण के आदेश पर बाकी प्रजा हस्तिनापुर चली गई। वही इस बीच श्रीकृष्ण वन में ध्यान मुद्रा में थे। इसी बीच वहां एक बहेलिया आया, उसने श्रीकृष्ण को हिरण समझ कर तीर चला दिया, जो उनके पैर के तालू में जा लगा। भगवान कृष्ण ने अपना मानव शरीर त्याग दिया और वैकुंठ चले गए। जिस मछली ने तांबे के तीर का चूर्ण निगला था, उसके पेट में एक छोटा सा धातु था। जिससे उसने तीर बनाया। उस तीरसे ही श्रीकृण के इस अवतार का अंत हो जाता हैं, वही उधर द्वारका नगरी समुद्र में डूब गई।

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