10th August 2020

जानिए क्या फर्क है शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में, बेलपत्र से क्या है संबंध

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शिवरात्रि तो हर महीने की चतुर्दशी पर आती है। शिवपुराण के अनुसार, फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी महाशिवरात्रि कहा गया है। इस बार महाशिवरात्रि 21 फरवरी यानी आज है। शिवभक्त इस दिन व्रत रखकर अपने आराध्य का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। मंदिरों में जलाभिषेक का कार्यक्रम दिन भर चलता है। आइए जानते हैं शिवरात्रि और महाशिवरात्रि के बीच का अंतर….

शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में अंतर – हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन आने वाली शिवरात्रि को केवल शिवरात्रि कहा जाता है। वहीं फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन आने वाले शिवरात्रि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। महाशिवरात्रि के दिन उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में लोग दीपस्तंभ लगाते हैं। दीपस्तंभ इसलिए लगाते हैं ताकि लोग शिवजी के अग्नि वाले अनंत लिंग का अनुभव कर सकें।

महाशिवरात्रि पर कथा – ज्यादातर लोग मानते हैं कि महाशिवरात्रि पर शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। लेकिन शिव पुराण में एक और कथा आती है जिसके अनुसार सृष्टि की शुरुआत में भगवान विष्णु और ब्रह्मा में विवाद हो गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। दोनों झगड़ रहे थे कि तभी उनके बीच में एक विशाल अग्नि-स्तंभ प्रकट हुआ जिसके तेज को देख दोनों चकित रह गए।

इस दिन से मनाया जाने लगा महाशिवरात्रि – उस स्तंभ का मूल स्रोत पता लगाने के लिए विष्णु, वराह का रूप धारण करके पाताल की ओर गए और ब्रह्मा हंस का रूप धारण करके आकाश की ओर चले गए। लेकिन बहुत कोशिशों के बाद भी उन्हें उस अग्नि-स्तंभ का ओर-छोर नहीं मिला। फिर उस स्तंभ से भगवान शिव ने दर्शन दिए। उसी दिन से भगवान शिव का प्रथम प्राकट्य महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाने लगा।

बेल-पत्र के बारे में जुड़ी कथा- 
पौराणिक ग्रंथों में बेल-पत्र के बारे में एक कथा मिलती है। यह कथा समुद्र-मंथन से जुड़ी हुई है। समुद्र का जब मंथन किया गया तो अमृत से पहले हलाहल नामक विष निकला। उस विष में इतनी गर्मी थी कि जीव-जंतु मरने लगे और सृष्टि के लिए संकट पैदा हो गया।

इसलिए शिव का पड़ा नीलकंठ नाम – भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। वह विष इतना घातक था कि शिव का कंठ नीला पड़ गया। इस कारण से भगवान शिव नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हैं। उस विष में इतनी गर्मी थी कि उसे पीने से भगवान शिव का मस्तक गर्म हो गया और उनके शरीर में पानी की कमी होने लगी।

भगवान शिव होते हैं प्रसन्न – देवताओं ने उनके मस्तक पर बेल-पत्र चढ़ाए और जल अर्पित किया क्योंकि बेल-पत्र की तासीर ठंडी होती है और वह शरीर में पानी की कमी को भी पूरा करता है। ऐसा करने से शिव को बहुत आराम मिला और वह तुरंत प्रसन्न हो गए। तो, भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए महाशिवरात्रि पर उन्हें बेल-पत्र और जल/दूध अर्पित किया जाता है।

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